दिव्यांग बच्चो के लिए जीते हैं तुनालका के वीरेन्द्र और विजया
गंगोत्री मेल के संपादक राजेश रतूड़ी से खाश बातचीत
उत्तरकाशी
अगर कुछ करने की चाहत हो इरादों को भी झुकना पड़ता है । ऐसा ही कुछ किया है नौगांव विकासखण्ड के तुनालका गांव के वीरेन्द्र जोशी और विजया जोशी ने आपको बता दे इन दोनों दम्पतियों ने 2001 में तुनालका गांव में एक पब्लिक स्कूल की नींव रखी थी जो कि आज दिब्यागों की शरण स्थली बना हुआ है । यहां पर 42 दृष्टिहीन ब 56 सामान्य बच्चे है उत्तराखंड के इतने सुदूरवर्ती गांव में सामान्य बच्चो के साथ दिब्याग बच्चो को पढ़ाना अपने आप मे किसी चुनोती से कम नही है जिसको ये दम्पति सहर्ष स्वीकार कर रहे है। इन्होंने अपना जीवन उन दिव्यांग बच्चो के नाम कर दिया है जो आज भी समाज की मुख्य धारा से अछूते है जिसके लिए ये दोनों दंपति उत्तराखंड के लोगो के लिए एक प्रेरणा के श्रोत बने है । दिव्यांग बच्चो के लिए उनके मन में कैसे काम करने की प्रेरणा हुई इस बारे में स्कूल की संचालिका विजया जोशी को पूछा तो उन्होंने बताया कि "वर्ष 2007 से पूर्व उनके स्कूल में एक कम दृष्टि दिव्यांग छात्रा को देखकर उन्हें दिव्यांगों के लिए काम करने की प्रेरणा मिली है उन्होंने बताया कि वह दिव्यांग छात्रा अत्यंत गरीव थी और समाज की मुख्य धारा से अछूती थी,उन्होंने बताया कि उनके आवासीय विद्यालय से पड़ा हुआ छात्र भारत की दिव्यांग दृष्टिबाधित फुटवॉल टीम का कप्तान है और एक दिव्यांग छात्र आई ए एस की तैयारी कर रहा है। उन्होंने बताया कि अब इन दिव्यांग बच्चो के साथ ही हम दोनों पति पत्नी का समय बीतता है और इन बच्चों के साथ हमे अच्छा भी लगता है । विजया जोशी का तो यहां तक कहना है कि हम दोनों के बाद इन दिव्यांग बच्चो को कौन सभालेगा हमेशा यही चिंता सताती है। अगर हर किसी के मन मे ऐसा ही जज्बा हो तो विश्व में कोई भी दिव्यांग तिरस्कृत नही होगा विजया जोशी और बीरेंदर जोशी के जज्बे को गंगोत्री मेल परिवार का सलाम
गंगोत्री मेल के संपादक राजेश रतूड़ी से खाश बातचीत
उत्तरकाशी
अगर कुछ करने की चाहत हो इरादों को भी झुकना पड़ता है । ऐसा ही कुछ किया है नौगांव विकासखण्ड के तुनालका गांव के वीरेन्द्र जोशी और विजया जोशी ने आपको बता दे इन दोनों दम्पतियों ने 2001 में तुनालका गांव में एक पब्लिक स्कूल की नींव रखी थी जो कि आज दिब्यागों की शरण स्थली बना हुआ है । यहां पर 42 दृष्टिहीन ब 56 सामान्य बच्चे है उत्तराखंड के इतने सुदूरवर्ती गांव में सामान्य बच्चो के साथ दिब्याग बच्चो को पढ़ाना अपने आप मे किसी चुनोती से कम नही है जिसको ये दम्पति सहर्ष स्वीकार कर रहे है। इन्होंने अपना जीवन उन दिव्यांग बच्चो के नाम कर दिया है जो आज भी समाज की मुख्य धारा से अछूते है जिसके लिए ये दोनों दंपति उत्तराखंड के लोगो के लिए एक प्रेरणा के श्रोत बने है । दिव्यांग बच्चो के लिए उनके मन में कैसे काम करने की प्रेरणा हुई इस बारे में स्कूल की संचालिका विजया जोशी को पूछा तो उन्होंने बताया कि "वर्ष 2007 से पूर्व उनके स्कूल में एक कम दृष्टि दिव्यांग छात्रा को देखकर उन्हें दिव्यांगों के लिए काम करने की प्रेरणा मिली है उन्होंने बताया कि वह दिव्यांग छात्रा अत्यंत गरीव थी और समाज की मुख्य धारा से अछूती थी,उन्होंने बताया कि उनके आवासीय विद्यालय से पड़ा हुआ छात्र भारत की दिव्यांग दृष्टिबाधित फुटवॉल टीम का कप्तान है और एक दिव्यांग छात्र आई ए एस की तैयारी कर रहा है। उन्होंने बताया कि अब इन दिव्यांग बच्चो के साथ ही हम दोनों पति पत्नी का समय बीतता है और इन बच्चों के साथ हमे अच्छा भी लगता है । विजया जोशी का तो यहां तक कहना है कि हम दोनों के बाद इन दिव्यांग बच्चो को कौन सभालेगा हमेशा यही चिंता सताती है। अगर हर किसी के मन मे ऐसा ही जज्बा हो तो विश्व में कोई भी दिव्यांग तिरस्कृत नही होगा विजया जोशी और बीरेंदर जोशी के जज्बे को गंगोत्री मेल परिवार का सलाम
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