मोक्ष का द्वार है निर्जला एकादशी , चौबीस एकादशियों के व्रत करने का फल मिलता है ज्येठ मास निर्जला एकादशी का व्रत करने से

उत्तरकाशी



एक साल में चौबीस एकादशी ब्रत पड़ते हैं जो श्रद्धालु इन चौबीस एकादशियों के व्रत करने में अक्षम है उसके लिए निर्जला एकादशी जिसको भीमसैनी एकादशी अथवा पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है के ब्रत के समान फल देता है।


ज्ञातव्य हो हमारे हिन्दू धर्म मे यू तो कई ब्रत ऐसे है जो इंसान को मोक्ष प्राप्ति का द्वार खोलते हैं उनमेसे ज्येठ के महीने में पड़ने वाली निर्जला एकादशी भी एक है। इसको कई भक्त श्रद्धालु अलग अलग महीने की दो और साल भर की चौबीस एकादशी का व्रत रखते है वही दूसरी और जो भक्त श्रद्धालु इन चौबीस एकादशियों का व्रत नही कर सकते है उनके लिए निर्जला एकादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है इस व्रत में बिना अन्न और जल को ग्रहण किये बिना उपवास करना पड़ता है,  जो कि साल की चौबीस एकादशी के समान फल देता है महाभारत काल मे भीमसैन ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर यह व्रत किया था और इसीलिए इसको भीमसैनी,पांडव एकादशी के नाम से कहा जाता है। क्यो कि अन्य पांडव और द्रोपदी साल भर की चौबीस एकादशी का व्रत बड़ी श्रद्धा और भाव से करते थे वही पांडवो में भीम अत्यधिक खाने पीने का शौकीन होने के कारण और अपनी भूख पर काबू न पाने की लाचारी को अपनी कमजोरी समझकर इस व्रत को नही कर पाता था और भीम को यह भी लगता था कि व्रत न करके वे भगवान विष्णु का अनादर कर रहा हैं जिसके लिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से इस बारे में परामर्श किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने भीम को निर्जला एकादशी करने का विधान बताया और कहा कि श्रद्धा और भाव से इस व्रत को करने से साल की चौबीस एकादशी के तुल्य फल मिलता है । भीम ने निर्जला ब्रत को बड़ी श्रद्धा और भाव से किया  इसी पौराणिक कथा के कारण इस निर्जला एकादशी को भीमसौनी एकादशी,पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। निर्जला व्रत में दिन भर भजन कीर्तन या किसी देवालय में रहकर भगवान विष्णु का ध्यान किया जाता है और दूसरे दिन निर्जला व्रत का पारायण प्रातःकालीन सूर्य उदय से पहले सालिगराम के स्नान चरणामृत का पान कर खोलने का विधान है। जो भी मनुष्य साल भर में पड़ने वाले एक निर्जला व्रत को मनो भाव से करता है उसे मनोवांच्छित फल की प्रप्ति होती है विष्णु भगवान मरने के पश्चात बैकुंठ में स्थान देते है  ऐसी मान्यता है। 


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