प्रचार प्रसार के अभाव में दम तोड़ रहे है जिले में सरकारी "फल सरक्षण केन्द्र" ,आखिर कब जागेंगे स्थानीय जन प्रतिनिधि
उत्तरकाशी
भले ही उत्तरकाशी जिले के हर्षिल और मोरी तहसील का सेब पूरी दुनिया मे प्रसिद्ध है किन्तु यहा के सेब और अन्य फलों का सरक्षण जिले में नही बल्कि अन्य जिलों, राज्यो में हो रहा है। जिले के सरकारी फल सरक्षण केन्द्र स्थानीय लोगो में जागरूकता न होने के कारण दम तोड़ रहे हैं बात करे जिले के फल सरक्षण केन्द्र की तो यहां पर भी कोई जयदा प्रगति नही दिखती नजर आती है भटवाड़ी में तो फल सरक्षण केन्द्र एक जर्जर भवन में खुला है जो 1991 के विनाशकारी भूकंप से क्षतिग्रस्त है भवन के एक कमरे में रखे काम करने के उपकरण भी अब धूल फांक रहे हैं ऐसा नही है कि इन सभी जगहों पर कर्मचारियों की नियुक्ति न हो और कर्मचारी ड्यूटी पर भी बराबर आते है तो अब सवाल यह उठता है कि आखिर इन सरकारी फल सरक्षण केन्द्रों में काम क्यो नही है इन सब यक्ष प्रश्नों के जवाब न तो विभाग के कर्मचारियों के पास है और न ही जिले के अधिकारियों के पास है स्थानीय लोग अपने ही फलों का बना जाम,चटनी,अचार ,मुरबा किसी बाहरी कम्पनी के मोहर लगे डिब्बो में दुगने और तिगुने दामो में खरीद कर खाना पसंद कर रहे हैं आखिर क्यो इन सब बातों पर इतने सालों से कोई मंथन क्यो नही हुआ है। क्यो जिले में फल सरक्षण केन्द्र खोलकर सरकार पर इतने कर्मचारियों की तनख्वाह का अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है जिससे सरकार को कोई मुनाफा न हो फलों के सरक्षण का सही मुनाफा तो बाहरी कम्पनियां ले जा रही है। मजेदार बात तो यह है आखिर यहा के सथानीय जन प्रतिनिधि इतनी गहरी नींद में क्यो सोए हुए है जिनको इस क्षेत्र के फल सम्पदा के दोहन की कोई चिंता नही है। वही विभाग की माने तो डीएचओ प्रभाकर सिंह का कहना है कि सब ठीक चल रहा है और जब सरकार को इन फल सरक्षण केन्द्रों से होने वाले मुनाफे की बात पूछी तो कोई जवाब नही दें पाए जल्दी ही और प्रगति करने की बात कह कर पल्ला झाड़ दिया अब देखने वाली बात यह होगी आखिर विभागीय अधिकारी आनेवले समय मे दम तोड़ रहे इन फल सरक्षण केन्द्रों के लिए क्या कुछ कर पाते है। क्या पता तबतक अधिकारियों की चहल कदमी देखकर स्थानीय जन प्रतिनिधियों की नींद भी खुल जाए।
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