सरक्षण व संवर्धन के अभाव में दम तोड़ रहा है रिंगाल उद्योग
उत्तरकाशी जिले। में जहा एकबार रिंगाल उद्योग अपनी चर्म सीमा पर हुआ करता था वहीं वर्तमान समय में यह उद्योग सरक्षण और संवर्धन के अभाव में दम तोड़ने की कगार पर है। एक समय ऐसा भी हुआ करता था लोग रिंगाल उद्योग के शिल्पकारों के घरों से ही रिंगाल की बनी वस्तुओं को उठाकर उपयोग में लाया करते थे वर्तमान में उपभोक्ता शिल्पकारों को ढूंढते फिर रहे हैं गिनेचुने शिल्पकार ही इस उद्योग को अपनाए हुए है।

जनपद में रिंगाल उद्योग वर्तमान समय में दम तोड़ने के कगार पर है कारण इस उद्योग का समय रहते सरक्षण और संवर्धन नही हुआ है चंद शिल्पकारों ने इसको अपनी आजीविका का साधन बनाया हुआ है। जिला उद्योग केन्द्रं उत्तरकाशी के बरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी जयंती कंसवाल की मानें तो वे इस उधोग के दम तोड़ने का कारण वन विभाग को भी मानते है उनका कहना है कि वन विभाग के द्वारा हस्त शिल्पियों को जगंलों से रिंगाल का दोहन नही करने दिया जाता है जिस कारण धीरे धीरे लोगों का इस उद्योग से मोह भंग होता गया परन्तु उद्योग विभाग की पहल पर एक बार पुनः लोग इसको अपनाने लगे है। विभाग के द्वारा हस्त शिल्पियों को 3 माह का प्रशिक्षण दिया जाता है तथा विभाग के द्वारा समय समय पर सरकारी स्टालों के माध्यम से हस्त शिल्पियों को इनके बने उत्पाद को बिक्री के लिए बाजार दिया जाता है इन सब बातों को देखते हुए पुनः लोगों का रुझान अब रिंगाल उद्योग की और बढ़ रहा है।
सरकारी आंकड़े जो भी कहे किन्तु वर्तमान समय में जिले के कुछ गाँवों के शिल्पकारों ने इस उद्योग को अपनाया हुआ है। जबकि जिले में देशी और विदेशी पर्यटक शैलानियों की आवाजाही पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गयी है और लोग रिंगाल से बनी टोकरी,कंडियो व अन्य वस्तुओं को रोजमर्रा की जिंदगी में वर्तमान में ज्यादा इस्तेमाल करना पसंद कर रहे हैं वावजूद इसके यह उद्योग दम तोड़ रहा है बड़ा प्रशन्न है।
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