उत्तर द्वारिका सेम मुखेम में नाग रूप में विराजमान है भगवान श्रीकृष्ण

कुंडली मे काल सर्प दोष से मिलती है भगवान सेम नागराजा के दर्शन से मुक्ति

टिहरी : समुद्र तल से 7 हजार फिट की ऊँचाई पर स्थित टिहरी जिले के प्रतापनगर विकासखण्ड में सेम मुखेम में भगवान श्रीकृष्ण के नागराजा स्वरूप में  करोड़ो लोगों की आस्था आज भी विद्यमान है। लोग यहां की यात्रा करने दूर दूर से पैदल चलकर दो तीन दिन के अलग अलग पड़ाव लगाकर पहुचते है। जिस कारण सेम नागराजा की 11 गते मंगशीर में हर तीन साल में यात्रा होती है जिसके लिए लोग यहां विराजमान भगवान नाग देवता के दर्शन को पहुचकर मन वांछित फल प्राप्त करते है। कुंडली में काल सर्प दोष से मुक्ति यही आकर मिलती है।

बताया जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका डूबने के बाद श्रीकृष्ण यहां विद्यमान हुए थे। मन्दिर के अंदर स्वयं भू सिला बिराजमान है। मन्दिर के दाई तरफ राजा गांगु रमोला के परिवार की मूर्तियां विराजमान है। नाग देवता की पूजा से पहले रमोला परिवार की पूजा करनी होती है। यहां के अनेक रहस्य और कहानियां प्रचलित है।

सिला रूप में सेम मुखेम मन्दिर के गर्व गृह में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन

मान्यतानुसार भगवान श्रीकृष्ण एकबार विचरण करते हुए इस स्थान पर पहुँचे यहां की हरियालिक सौन्दर्यता उन्हें भा गयी थी। और श्रीकृष्ण ने यही पर रहने का फैसला ले लिया था। फिर उन्होंने यहां के गढ़पति गांगु रमोला से जगह मांगी अनजान समझकर गढ़पति ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। काफी समय तक भगवान इस क्षेत्र में ही विचरते रहे तब एक रात्रि को नागवंशी राजा के सपने में आये और इस जगह पर रहने की बात कही नागवंशी राजा अपनी सेना के साथ उस स्थान पर भगवान के दर्शनों को पहुँचे तो गांगु रमोला ने उन्हें अपने यहां आने नही दिया इस पर नागवंशी राजा क्रोधित होकर गांगु रमोला पर आक्रमण करने की ठान ली थी पर उन्होंने आक्रमण करने से पूर्व गांगु रमोला को भगवान श्रीकृष्ण के सत्य स्वरूप के बारे में बताया जब गढ़पति गांगु रमोला ने भगवान श्रीकृष्ण के बारे में सुना तो उनको अपने किये पर पश्चावा हुआ।

और भगवान से क्षमा याचना की भगवान ने गढ़पति को क्षमा कर दिया। और भगवान श्रीकृष्ण  नागवंशियों के राजा नाग देवता के रूप में इस स्थान में रहने लगे तथा कुछ समय पश्चात अपना रूप एक बड़ी पत्थर की सिला में हमेशा के लिए स्थापित हो कर अपने बैकुंठ धाम चले गए। भगवान का सिला स्वरूप आज भी मन्दिर के गृह में विराजमान है। मान्यता है कि आज भी भगवान का एक अंग इसी स्थान पर विराजमान है जो कि करोड़ो लोगों की मनोकामनाओं को पूरा कर आस्था का प्रतीक बना हुआ है। कई लोग सेम नागराजा की कथा को यमुनाजी में रहने वाले कालिया नाग की कथा से भी जोड़कर देखते है जिसको भगवान श्रीकृष्ण ने यमुनाजी से भगाकर सेम मुखेम में रहने को कहा था तब कालिया नाग ने भगवान श्रीकृष्ण से दर्शन देने की विनती की थी जिसको पूरा करने के लिए भगवान मुखेम में आये थे। कहानियां और किमदन्तिया कुछ भी हो जो भक्त आज भी यहां श्रद्धा भाव पूर्वक आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। जिसको हजारों की संख्या में लोगों ने महसुस किया है। इसलिए लोग हजारों की संख्या में 11 गते मंगशीर को यहां पर हर तीन साल में होने वाली यात्रा में प्रतिभग कर पुण्य के भागी बनते है।

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