आचार्य अमित रतूड़ी से जानिए नवरात्र शब्द की व्याख्या और माता दुर्गा के नो स्वरूपों की पूजा का विधान

राजेश रतूड़ी
उत्तरकाशी : आचार्य अमित रतूडी के साथ नवरात्र को लेकर "गंगोत्री मेल" की खाश बातचीत
 
*यादेवीसर्वभूतेषु शक्ति रूपेणसंस्थिता नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नमः* 

 *नवरात्रि क्या है? जानिए नवरात्र का वैज्ञानिक-आध्यात्मिक रहस्य* 

नवरात्र' शब्द से नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियों) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नवरूपों की उपासना की जाती है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक है।

भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को 'रात्रि' न कहकर 'दिन' ही कहा जाता लेकिन नवरात्र के दिन, 'नवदिन' नहीं कहे जाते।
मनीषियों ने वर्ष में चार बार नवरात्रों का विधान है बनाया(चैत्र ,आषाढ़,आश्विन,माघ)।  विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से 9 दिन अर्थात रामनवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मास बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के 1 दिन पूर्व तक। परंतु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।

इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
नवरात्रों में शक्ति की 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्तिपीठों पर नहीं पहुंच पाते, वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।
आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं, पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। सामान्य भक्त ही नहीं, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और न ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। बहुत कम उपासक आलस्य को त्यागकर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं ।
मनीषियों ने नवरात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।
दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है, जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।
वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं, उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।
नवरात्र या नवरात्रि?
संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'नवरात्रि' कहना त्रुटिपूर्ण है। 9 रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्विगु समास होने के कारण यह शब्द पुल्लिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुद्ध है।
नवरात्र क्या है?
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में 1 साल की 4 संधियां हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के 2 मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक आशंका होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
नौ दिन या रात
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रतिपदा से नवमी की दोपहर तक व्रत-नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहां रात गिनते हैं इसलिए नवरात्र यानी नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक द्वारा हमारे शरीर को 9 मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।
इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारु रूप से क्रियाशील रखने के लिए 9 द्वारों की शुद्धि का पर्व 9 दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए 9 दिन 9 दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
शरीर को सुचारु रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किंतु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन-मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व 
दुर्गा सप्तशती का पाठ करना भक्तों के लिए बहुत शुभ माना गया है। व्यास जी के द्वारा रचित महापुराणों में से एक 'मार्कण्डेय पुराण' में दुर्गा सप्तशती की रचना की गई है। इसका उद्देश्य मानवों का कल्याण करना है। दुर्गा सप्तशती को शक्ति और उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ माना गया है। दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोक और 13 अध्याय हैं। इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है, जिनमें प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) तथा उत्तम चरित्र (महा सरस्वती) है। दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक चरित्र में सात देवियों का उल्लेख मिलता है।
प्रथम चरित्र में तारा, काली, छिन्नमस्ता, सुमुखी, बाला और कुब्जा का उल्लेख किया गया है।
द्वितीय चरित्र में लक्ष्मी, काली, ललिता, दुर्गा, गायत्री, अरुन्धती और सरस्वती का उल्लेख मिलता है।
तृतीय और अंतिम चरित्र में माहेश्वरी, ब्राह्मी, वैष्णवी, कौमारी, वाराही, नारसिंही और चामुंडा का उल्लेख है।
मार्कण्‍डेय पुराण में ब्रहदेव जी कहते हैं कि जो भी जातक दुर्गा सप्तशती का पाठ करेगा उसे सुख की प्राप्ति होगी। भगवत पुराण में भी ये बात वर्णित है कि मॉं जगदम्बा का अवतरण श्रेष्ठ मानवों की रक्षा के लिए हुआ है। इसी तरह ऋगवेद के अनुसार मॉं दुर्गा ही आद्य शक्ति हैं और उन्हीं के द्वारा पूरे संसार का संचालन होता है और उनके अलावा इस जगत में कोई अविनाशी नहीं है। दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का विवरण नीचे दिया गया है।

नव दुर्गाओं की किन किन स्वरूपों में की जाती है पूजा


" *शिवोहि शवतां याति कुण्डलनिन्यां*विवर्जित:"* 

अलग अलग वर्ष की कन्याओं में होता है मां के  अलग अलग स्वरूपों का वास और कितने वर्ष तक की कन्याओं का होता है पूजन आइए जानते हैं...

दो वर्ष तक की कन्याओं को मां कुंआरी का स्वरूप माना जाता है. कहा जाता है इनकी पूजा करने से धन से जुड़े संकट दूर होते हैं साथ ही इससे धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है
दो से तीन साल तक की कन्याओं को देवी त्रिमूर्ति का स्वरूप माना जाता है. ऐसे में इनकी पूजा अर्चना करने से धन, धान्य और जीवन में सकारात्मकता आती है.

चार वर्ष की कन्याओं की पूजा  देवी कल्याणी के रूप में की जाती है. मान्यता है कि इनकी पूजा करने से परिवार के सदस्यों का कल्याण होता है और जीवन सुखमय होता है.

पांच साल की कन्याओं को देवी रोहिणी का रूवरूप माना जाता है. इनकी पूजा करने से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है और परिवार के सदस्य सेहतमंद बने रहते हैं.

छह साल की कन्या का पूजन मां कालिका के रूप में किया जाता है. यह देवी शक्ति और विजय का प्रतीक मानी जाती हैं. ऐसे में इनकी पूजा करने से शक्ति और विजय की प्राप्ति होती है 
सात वर्ष की कन्याओं को मां चंडिका का रूप माना जाता है, जिन्हें मां दुर्गा का उग्र स्वरूप माना जाता है. मां दुर्गा के इस रूप की पूजा करने से विजय, धन, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.

आठ साल की कन्याओं को देवी शांभवी का स्वरूप माना जाता है, इनकी पूजा करने से कोर्ट कचहरी या वाद विवाद से जुड़े मामलों में सफलता प्राप्त होती है.

नौ वर्ष की कन्या को साक्षत् मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है. कहा जाता है कि इस कन्या की पूजा करने से शत्रु पराजित होते हैं और सफलता प्राप्त होती है. 

10 वर्ष की कन्याओं को देवी सुभद्रा का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है, इस रूप में पूजा कन्या पूजन करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाओं पूरी होती हैं

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