चालदा महासू महाराज ने वर्ष 2019 से लेकर वर्ष 2022 तक सो साल बाद प्रवास किया था कोटा तपलाड गाँव में

राजेश रतूड़ी
देहरादून :  जौनसार बावर क्षेत्र के रीति रिवाज बोली भाषा और संस्कृति अपने आप मे बेजोड़ है। जिसका नजारा चकराता क्षेत्र के ग्राम कोटा तपलाड में देखने को मिलता है।
          देहरादून जिले के चकराता क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम कोटा तपलाड गाँव के लोग परम्परागत वेशभूषा में रहने के साथ साथ आज भी अपनी पौराणिक सभ्यता को धरोहर के रूप में संझौये हुए है । गाँव मे स्थित महसू देवता और माँ काली के मन्दिर  का इतिहास काफी पुराना है पूर्व में यह मंदिर पत्थरों और लकड़ियों से निर्मित हुआ करता था ग्रामीणों ने पुनः इसको जीर्णोद्धार कर हिमांचली शैली में अनूठी शिल्पकारी का अनूठा और बेजोड़ 
 लकड़ियों की नक्कासी से भब्य रूप देकर पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनाया है। मन्दिर में लकड़ियों पर उकेरी आकृतियां की अनूठी शैली यहाँ पर आनेवले पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करती है। मन्दिर में एक और  चालदा महासू देवता विराजमान रहते है। बताया जा रहा है वर्ष 2018 से लेकर वर्ष 2022 तक चालदा महाराज 100 साल बाद ग्राम कोटा तपलाड आकर 4 साल के लिए रुके थे उस दौरान मन्दिर में विभिन्न धार्मिक गतिविधियों के साथ भण्डारे चलते रहते है, आसपास के गावो से हजारों की तादाद में दर्शनों के लिए ग्रामीण यहां पहुंचते हैं। चालदा महाराज जौनसार बावर क्षेत्र के अलग अलग गांवों में अपनी इच्छा अनुसार प्रवास करते है।
मन्दिर के दूसरी और काली माता का मन्दिर है यहां पर हमेशा ही पूजा अर्चना व धार्मिक गतिवियाँ चलती रहती है। ग्रामीणों की काली माता व महासू देवता पर अटूट विश्वास है। यही कारण है कि ग्राम कोटा तपलाड गाँव के ग्रामीण वर्तमान में समृद्धशाली है और खुशहाल है।

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